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बुधवार, 3 मई 2017



यहाँ गिरे तो उठने सा मजा है,
इश्क की गलियों में संभलना क्या है ।

डुबो के दर्द में वो सुकून दे गया,
मोहब्बत मर्ज है तो आखिर दवा क्या है ।

मिली नजर तो कहीं हम कहीं हमारा वजूद,
उनकी आँखे हैं या पैमाना भरा है।

एक अदद जिस्म और मेरे नाम के सिवा,
मेरे वजूद में अब मेरा बचा क्या है।

चंद साँसो का सफर बेवजह सा, बेमानी  सा,
जिंदगी प्यार के सिवा क्या है।

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

खुदा भी हंस पड़ा मेरे मोहब्बत के फ़साने पे,

हवा भी आज कानों में मेरी खिल्ली उड़ा गई।
दिन रात जागे हाय जिनके इन्तजार में
वो आये सामने जैसे ही हमको नींद आ गई।

कहानी ख़त्म हो जाती यहीं पर तो भी अच्छा था,
बताते शर्म आती है हमारा हाल ऐसा था,
वो कानो में सुनाते रह गए किस्सा मोहबत का,
हमारी आँख न खुली ,खुमारी ऐसी छा गई।

जुदाई कितनी भारी थी, कैसा बेदर्द आलम था,
तुम्हारे बिन तो हर मौसम यहाँ पतझर का मौसम था,
उन्हें हर दर्द अपना और हर आंसू दिखाना था,
आया होश भी कब , जब उन्हें वापस को जाना था।
फसाने दिल में रह गए, लबों पे आह आ गई ,
गए तुम क्या .तुम्हारे साथ मेरी हर अदा गई...


अनुप्रिया ...

शुक्रवार, 15 मार्च 2013















पाँव जैसे धरती,
सूरत अम्बर,
नन्ही  सी बिटिया
आई मेरे घर।

चिड़ियों सी चहके,
फूलों सी महके,
झूले झूला
सपनों पर।
प्यारी सी बिटिया
आई मेरे घर।

चीनी की बोरी  है ,
चंदा चकोरी है ,
मत देखो
लग जाएगी नज़र।
भोली सी बिटिया
आई मेरे घर।

मक्खन की मटकी ,
है रंगों की रंगोली,
रूनकी -झुनकी ,
रोली -पोली,
लगती है परियों सी सुन्दर।
दुलारी सी बिटिया
आई मेरे घर।


अनुप्रिया ...


बुधवार, 9 नवंबर 2011

अजीब जिद है...



अजीब जिद है...
ना  कहने  देते हो,
ना चुप रहने देते हो.
ना ख़ामोशी में आराम,
ना शिकवे में है  सुकून,
आज कह   ही दो 
तुम आखिर मुझसे चाहते क्या हो...

तुम जैसा सनम जिसका
उसे किस ठौर  मिले  चैन,
ना जीने में भला हो और  
ना मरने में भला हो...

अब इस दीवानेपन का
क्या जवाब दे कोई,
जो देखे तो हो  गुनाह ,
ना देखे तो खफा हो...

सीने से लगा लो 
या सूली पे चढ़ा दो... 
हाँ! हो गया है प्यार,
अब  जो चाहे सजा दो.

अनुप्रिया...

सोमवार, 28 मार्च 2011

(in loving memory of my elder brother manuj kehari ,21 .9 . 1976 -26 .3 .2010 )

आज से ठीक १ साल पहले हमने उन्हें खो दिया...अजीब बात ये है कि जिस वक़्त वो जीवन और मृत्यु की लड़ाई लड़ रहे थे, ठीक उसी वक़्त मैं उनसे दूर बैठी अपना ब्लॉग अकाउंट बना रही थी...आने वाली दुर्घटना से अनजान मैं, अनजाने में ही अपने लिए वो मंच तैयार कर रही थी जिसने दुःख, अवसाद, और अकेलेपन के इस एक साल में मुझे सबसे ज्यादा संभाला...
मेरा ब्लॉग पढने वाले  और समर्थन करने वाले अजनबी मित्रों को मेरा बहुत- बहुत धन्यवाद.
वो मेरे दोस्त , दुश्मन भी (क्यों कि हम एक दुसरे से जिस तरह लड़ते थे वैसे दुश्मन ही लड़ा करते हैं)  ,गुरु भी(चलने से ले कर पढने तक, सब उन्होंने ही सिखाया यहाँ तक कि जीवन का उद्देश्य साधना भी उनसे ही सिखा मैंने) , आलोचक भी( मेरी कोई गलती उनकी नज़र से ओझल नहीं थी और न ही वो उसे बक्शते थे,तुरंत आलोचना करते थे) , पता नहीं और न जाने क्या-क्या  थे?  हाँ !पर उनके रहते कभी ये अहसास नहीं था कि अगर कभी वो न हुए तो मैं जीना भूल जाउंगी. मैंने बचपन से ले कर आज तक हजारों बार उनसे ये कहा कि मैं उनसे बहुत प्यार करती हूँ पर ये नहीं कहा कि भाई! मैं आपसे इतना प्यार करती हूँ कि अगर आप कभी नहीं रहे तो मैं जिन्दा लाश बन जाउंगी...आप मुझे छोड़ के कभी मत जाना.
काश कह दिया होता ...तो शायद...


 मैं जब से इस दुनिया को जानती हूँ, मेरे लिए सूरज, चाँद, आसमान और धरती ,और आस पास कि बाकी चीजों कि तरह वो भी सहज  थे. मैंने कभी सोचा ही नहीं कि वो नहीं होंगे...और मैं ...

 हे इश्वर ! उनकी आत्माँ को शांति देना, अपने ह्रदय में स्थान देना...उनसे कहना कि हम सब उनसे बहुत प्यार करते हैं, और जाने- अनजाने अगर हमसे कोई भूल हुई हो तो वो हम सब को छमा कर दें.

(आज मैं कुछ भी सोच समझ कर नहीं लिख रही...जो भावनाएं लिखवा रही हैं बस वो लिखती जा रही हूँ, सो, त्रुटियों के लिए खेद है.)



उस कयामत की शाम को

जिन्दगी हुई हमसे खफा...
रूह के हर जर्रे में
दर्द जैसे घुल गया...

घर की चौखट लाँघ कर
खुशियाँ गई शमशान को...
बूढी हड्डी ने दिया कन्धा
अपने अरमान को...

वो, वंश का जो मान था,
मृत्यु कि गोद में सो गया...
सौभाग्य रूठ कर हमारा
काल के गाल में खो गया...

चूड़ियाँ टूट कर, ह्रदय की
फर्श पर बिखरी हुई थीं ,
घर की शोभा बेवा हो कर
आँखों के आगे खड़ी थी...

माँ की चुप्पी में
सुनाई दे रहा चीत्कार था,
खो गया वो
जो उसके अस्तिव का आधार था...

अपनी कहूँ क्या ,मैं तो उसका
हिस्सा थी ,परछाई थी...
उसका जाना मुझसे मेरी
आप से ही विदाई थी...

आंसुओं के कई समंदर
एक पल में पीना
क्या होता है...
हमसे पूछो दोस्तों
मर- मर के जीना
क्या होता है...


अनुप्रिया....

(in  loving  memory of my elder brother manuj kehari  ,21  .9 . 1976 -26 .3 .2010  )








रविवार, 20 फ़रवरी 2011

पुरानी डायरी का एक पन्ना...

आज पुरानी डायरी में बरसों पुराना ख्वाब मिला. एक शाम घर कि छत पर बैठी सूर्यास्त देख रही थी. मुझे सूर्योदय और सूर्यास्त देखना बेहद पसंद है. आसमान के बदलते रंगों में जैसे जीवन की सारी उर्जा संचित होती है. १८ -१९ साल की उम्र थी तो कल्पनाएँ और सपने भी सूरज की लालिमा की तरह ही सुर्ख थे. उस दिन आसमान को निहारते हुए ये चंद पंगतियाँ लिखी थी मैंने.
चलिए आज आपसे इन्ही को बांटूं...काव्य के दृष्टिकोण से ये कैसी हैं ये बता पाने जितनी काबिलियत तो नहीं मुझमें, पर दिल के बेहद करीब है ये छोटे-छोटे सपने... 


 


जब संध्या का गुलाबी आँचल
अम्बर के सीने पर लहराता है
और सूर्य आकाश  सुंदरी के माथे पर
बिंदिया बन कर चमचमाता  है...
तब,
मैं अपनी तन्हाई में
प्रकृति के उस नयनाविराम
सौंदर्य को अपलक निहारा करती हूँ...
और,
सोचती हूँ कि
काश मैं भी आकाश सुंदरी सी होती,
मेरे भी तन पर सुर्ख गुलाब सा आँचल थिरकता,
और कोई सूर्य
मेरे भी माथे पर
दमकती  बिंदिया बन कर
मेरी गोरी काया को
नया आकर्षण प्रदान करता,
मुझे भी संसार उसी प्रशंसनीय नज़र से निहारता
जैसे
मैं अपनी तन्हाई में प्रकृति के उस
नयनाविराम सौन्दर्य को अपलक निहारा  करती हूँ....

अनुप्रिया...

                                                                          

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

तो कुछ और बात होती...

valentine's day special

 


मैं जिन्दगी हूँ तेरी, ये जानती हूँ लेकिन
कभी खुद से जो कह देते,तो कुछ और बात होती...
खामोशियों की जुबां भी समझती हूँ लेकिन
जो अल्फाज होते,तो कुछ और बात होती...



जो मोहब्बत लहू सी बसी हो रगों में,
वो मोहताज़ इजहार की तो नहीं हैं,
कभी डूब कर मेरी आँखों में लेकिन
इजहार जो कर देते तो कुछ और बात होती...


 इश्क चंचल नदी है जो रुकना ना जाने,
ये जमाने का कोई चलन भी ना माने,
तोड़ कर चंद रस्मों-रिवाजों के बंधन,
प्यार खुल के जो कर लेते तो कुछ और बात होती.


कभी तेरी नज़र से नज़रें उलझतीं,
कभी तन्हाइयों में मुलाकात होती.
रूहानी मोहब्बत है,मानती हूँ लेकिन
कभी बाहों में भर लेते तो कुछ और बात होती.


मैं जिन्दगी हूँ तेरी,ये जानती हूँ लेकिन
कभी खुद से भी कह देते तो कुछ और बात होती...





अनुप्रिया...