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सोमवार, 26 अप्रैल 2010



जिंदगी तुझे समझने की कोशिश हज़ार की,
सूरत तेरी हर बार कुछ नया दिखा गई,
देखा तो लगा दर्द की छोटी सी लहर थी,
झपकी पलक तो वो मेरी दुनिया उड़ा गई...


तुम थे तो मेरी जान ... कुछ भी थे नहीं मेरे,
हर रोज़ तुमसे रंज ,थे शिकवे गिले भरे...
और आज जब तुम छोड़ कर दुनिया मेरी गए...
ऐसा लगा की हर  ख़ुशी...हर  सुकून ले गए...


ऐ दोस्त... ये खेल भी अजीब है कुदरत के
हर चीज़ जो उसने समेटी थी शौख से...
कहता था इसमें प्राण है उसके बसे हुए...
हर चीज़ उसकी आज भी है वैसे ही रखी हुई...
ढूंढा ... तो बस एक वो ही नहीं पास अब मेरे...


अब रात दिन का रोना और खुद से शिकायते
आवाज़ जब तुमने दिया था...मूड गए होते...
दिल में क्या है , तुमसे इतना पूछ  ही लेते...
आह ! जी भर के तुमको देख ही लेते...


अब याद आती है तमाम बाते वो तेरी,
जो दिख रही है दोस्तों वो दुनिया नहीं मेरी...
मैं  एक पथिक राह भटक आ गया यहाँ...
इस जिन्दगी के पार है मंजिल कही मेरी...

(in memory of my loving brother late Manuj Kehari ...

अनुप्रिया...