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मंगलवार, 18 जनवरी 2011

खामोशियाँ...



खामोशियों को ना  बेजुबां समझो,
 बंद होठों से ये हर नज्म गुनगुनायेंगी,
तुम  लब्ज  टटोलते रहना  ,
ये बात राज की  कह जाएँगी.

रंग बदलेगा जब उनके गालों का,
मोहब्बत भी बयां हो  जाएगी,
इश्क अल्फाज कहाँ ढूंढेगा,
कयामत जब दिलों पे आएगी.


उलझे जुल्फों से होंगी फरियादें,
कसम नज़रों से उठाई जाएगी,
दर्द रीसेगा धडकनों में जब,
पलक की ओट भींग जाएगी.


छुप के चेहरा निहारेगा कोई...
सादगी में अदा हो जाएगी.

प्यार देगा दिलों पे  जब दस्तख,
बिन कहे दास्ताँ  हो  जाएगी...

अनुप्रिया...       

रविवार, 16 जनवरी 2011

हाँ! मैं औरत हूँ...

www.hamarivani.com

माफ़ करें, ये कोई कविता नहीं है...ये वो पीड़ा है जिसे हर औरत  रोज कमो-वेश सहती हैं...
परन्तु अब बस...


हाँ! मैं औरत हूँ,
तो इसलिए
क्या तुम मेरे अस्तित्व
पर प्रश्नचिन्ह उठाओगे?
मेरी  गरिमा की परिधि नापोगे,
मेरे स्वाभिमान की  सीमा बताओगे.

तुम,
जिसे साँसे लेना मेरे गर्भ ने सिखाया,
जिसे चलना मेरी ऊँगली पकड़ कर आया,
आवाज को आकार देना जिसे मैंने बताया,
मेरी  छमता को  अब ऊँगली तुम दिखाओगे.

बहुत  सह लिया मैंने.
तुम भूल रहे हो,
जिस ताकत पर गुरुर है तुम्हे,
वो मेरी छाती की लहू से बना है...
मुझे मत दिखाओ ये शक्तिशाली  बाजू अपने,
ये वरदान भी मेरा ही दिया है.

जिस प्रसव पीड़ा को सह कर
दिया है जन्म तुमको,
उसका एक अंश भी सहा होता ,
तो समझ पाते तुम
मेरे अन्दर की  ताकत ,
मेरी शक्ति को.

माँ बनी  तो ममता दी मैंने,
प्रेमिका बनी तो समर्पण दिया,
पत्नी बनी तो पूजा तुमको,
बेटी बन कर भी मान ही अर्पण किया.

और तुम,
हर रूप में करते रहे शोषण मेरा,
अपने अभिमान में चूर हो कर तुमने,
घर से चौराहे तक
नरक बना दिया जीवन मेरा.

अंधे हो तुम,
मेरी ममता को कमजोरी मान कर
मेरा अवसाद बना दिया,
बहरे भी हो जाओगे,
लोरी को गर्जन भरा संवाद
बना दिया.

अपने मद में मस्त हो कर
खींचते ही जा रहे हो
मेरे सहन शक्ति की डोर को...
कभी तो टूट ही जाएगी.
तुम्हारे जीवन को रौशन करने वाली
मेरे प्रेम की ये लौ ही
एक दिन
तुम्हारा  अंधा अभिमान जलाएगी.
तुम देखना.....


(आंकड़े और चित्र गूगल के सौजन्य से)

अनुप्रिया...

शनिवार, 8 जनवरी 2011

बहुत बोलती हैं ये आखें तुम्हारी...


आँखें...शरीर का सबसे सुन्दर हिस्सा, मन का आइना, आत्मा की परछाई.
आज एक रचना उनकी खुबसूरत  आँखों के लिए...

शोरो-गुल मच गया है दिल के नगर में,
मन के मौसम में फैली अजब सी खुमारी...
एक नज़र में सुना डाली पूरी कहानी,
बहुत बोलती हैं ये आखें तुम्हारी.


कभी है ये चंचल, हो जैसे कोई झरना,
विरानो को छू कर सिखा दें सवारना,
इनकी गहराइयों में समंदर हो जैसे,
मुझको अच्छा लगे इनकी  तह में उतरना.

कभी गीत कोई , कभी ये गजल हैं,
तुम्हारा चेहरा झील जैसा, ये आँखे कमल हैं,
सजदे में झुक जाऊं दिल मेरा चाहे,
ये आँखें तुम्हारी खुदा की शकल हैं.

ये आँखें तुम्हारी हैं जादू की पुडिया,
इशारों पे अपनी नचाती हैं  दुनिया
उठती हैं पलके तो उगता है सूरज,

जो झुक जाएँ , आ जाये चंदा की बारी.

गुलाबी से  अम्बर  में  काला सा बादल
समेटे हुए हैं काजल की धारी .
एक नज़र में सुना डाली पूरी कहानी,
बहुत बोलती हैं ये आँखें तुम्हारी...

अनुप्रिया...

बुधवार, 5 जनवरी 2011

tumhara hriday...

उसे प्यार हो गया था...एक ऐसे लड़के से जिसने कभी उसकी तरफ देखा ही नहीं. शायद इस लिए कि रंग रूप में बड़ी साधारण थी वो. पर जिस तरह वो उसे चाहती थी वैसी चाहत ना  मैंने  देखी ना सुनी.
उस  लड़की के इकतरफे प्यार की बेचैनी, उसकी तड़प को समझने की कोशिश करती एक रचना...


तुम्हारा ह्रदय
पत्थर की एक ऐसी गुफा है
जिसमे ना कोई खिड़की है
ना कोई झरोखा
और ना ही कोई दूसरा सुराख.
या फिर
वह शुन्य है
जिसमे ना प्यार है
ना नफरत
और ना ही कोई और अहसास.
या
एक ऐसी शिला
जो महसूस नहीं कर सकती,
ना धडकनों में उठती टीस,
ना प्रेम की प्यास.
आओ!
कभी झाँकों  
मेरी आँखों में
और देखो ऐ पासान हृदयी,
तुम्हे पिघलाने के लिए
कितनी रातों तक
अविराम तनहा-तनहा
जलती रही है आँखें मेरी.
आओ !
कभी पूछो मेरी उदास शाम से,
तुम्हारी शुन्यात्मकता को
मधुर कोलाहल देने के लिए
खुद को किस तरह
तनहाइयों के अनंत शून्यों में
खो दिया है मैंने.
ना मैं मेनका हूँ
ना उर्वशी 
और ना ही कोई  और अदभुत सुंदरी,
तुम्हारे प्यार से शुरू हो कर
वही सिमट जाती है
मेरे परिचय की हर धुरी.
अब तुम्ही बताओ
कहाँ और कैसे जाऊं मैं
तुम्हारी आरजू छोड़ कर,
मेरी जिन्दगी का हर रास्ता
ला कर खड़ा कर देता है मुझे
तुम्हारी ही गली ,
तुम्हारे ही मोड़ पर. 

पड़े हैं दर पे तेरे रख के दिल और जान  हम सरकार,
कि  सांसे टूटे उससे पहले  मोहब्बत  तेरी मिल जाये,  
खुदा नाराज़ हो तो हो, मिटा दे हर निशा मेरा,
मगर मिट जाने से पहले एक झलक   तेरी मिल जाये...                                    


अनुप्रिया...

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

tum mere liye bahot khas ho...

आज जो कह रही हूँ वो शब्द तो मेरे हैं पर अहसास किसी और के है. अरे! आप गलत समझ रहे हैं, वो अनपढ़ नहीं है, इंजिनियर है भाई...MNR ,इलाहाबाद, toper { (: with scholarship :) },लेकिन भावनाए व्यक्त करना इंजिनियरस के बस कि बात कहाँ.
ये जनाब मेरे 'वो' हैं, सोचा इनसे भी मिला दूँ...बताइयेगा जरुर, मुलाकात कैसी लगी?  :) :) :)


कैसे कहूँ ?
मुझे कहना नहीं आता,
तुम्हारी तरह
शब्दों से खेलना
नहीं आता.

पता नहीं
तुम कैसे देखती हो
काजल में 'बादल '
'सावन'में आँचल
हवा की ताल में
ढूंढ़ लेती हो
सीने की हलचल.

पूनम के 'चाँद' को
चेहरा कह देती हो,
'चांदनी' को बाँहों का
 घेरा कह देती हो .

सुबह की 'धूप' में
महसूस करती हो
 प्यार की गर्मी,
'ओस' की बूंद में
देख लेती हो
आँखों की नमीं.

उगता 'सूरज'
माथे पे सजा लेती हो,
'मौसम' को बालों का
गजरा बना लेती हो.

अजीब हो तुम,
ना जाने कैसे 
हर भाव गीतों में
पिरो देती हो,
दर्द हो या ख़ुशी
सब कुछ शब्दों में
संजो देती हो.

इसलिए शायद
मैं कहूँ ना कहूँ
तुम समझ  लेती हो
मेरा  मौन,
मेरे अहसास को,
इसलिए शायद 
बिना बताये भी 
जान लेती हो
कि तुम मेरे लिए
बहुत 'ख़ास' हो... 

अनुप्रिया...

सोमवार, 20 दिसंबर 2010



जाने दो , क्या हांसिल होगा अपने जख्म दिखाने  से,
हमको नहीं उम्मीद जरा भी इस बेदर्द ज़माने से.

जिसको हमने बचा  के रखा दुनिया भर की आफत से,
दिल भारी हो जाता है मुझ पर उसी के  पत्थर उठाने से.

दिल टुटा ,रिश्ते टूटे और टूटे ख्वाब ना जाने कितने,
बस हिम्मत की डोर ना टूटी वक़्त के ताने बाने से.

जब थी जरुरत कोई थामे, कोई अपना नहीं रहा,
हो गई है पहचान सभी की , बुरे वक़्त के आने से.

अब छोड़ो ये रोना धोना, बेमतलब के शिकवे गिले,
जीवन तो ख़त्म नहीं होता ना ,एक दो ख्वाब टूट जाने से.

अनुप्रिया...

(तस्वीर मेरे गाँव की है. गंगा के किनारे की सुबह...कितनी पवित्र कितनी सुरमई होती है ना...)

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

ek jindgi ki baat hai...gujar lene do.

बहका लो अपनी बाँहों में
कुछ ख्वाब सवार लेने दो,
एक जिन्दगी की बात है
गुजार लेने दो.

छू जो लिया तुमने  तो 
पूरी हो गई हूँ मैं,
इस अहसास को अब
रूह तक उतार लेने दो.


तुम्हारे अक्स में देखी है
मैंने खुदा की सूरत,
जी भर के मुझे चेहरा ये
निहार लेने दो.


अभी आये , अभी बैठे
अभी जाने की बात कर दी,
अरे ! सुकून से साँसे तो
दो-चार लेने दो.


फ़रिश्ते भी जिसे पाने को
आपना दीनो-इमां भूलें,
मेरे महबूब, मुझको तुमसे
वो प्यार लेने दो.


तुम्हारे नाम में जैसे बसी हो
सातों सुरों की सरगम,
हर शय को नाम अपना
पुकार लेने दो.


आखें तुम्हारी लगती हैं
मुक्कमल किताब जैसी,
गजलों को इनसे अपने 
अशआर लेने दो.


अनुप्रिया...

(अशआर:-
The form ghazal is a collection of mulitiple ashaar - each of which should convey a complete thought without any reference to other shayari of the same ghazal. In fact, though belonging to the same ghazal, the different ashaar therein can have completely different meaning and tone relative to one another.)