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शनिवार, 10 अप्रैल 2021

मैं खामोशी सुनना चाहती हूं।

बंद आंखो के भीतर
एक नया संसार बुनना चाहती हूं।
मैं खामोशी सुनना चाहती हूं।

हृदय की ताल हो
एकांत गाए,
एक ऐसा गीत गुनना चाहती हूं।
मैं खामोशी सुनना चाहती हूं।

किसी अनजान पथ पे खुद को खोना,
बड़ा सुन्दर है जानो शून्य होना,
वहीं सौन्दर्य चुनना चाहती हूं।
मैं खामोशी सुनना चाहती हूं। 

माया मोह के ये ढोल - ताशे
जगत के भूल कर सारे तमाशे
जोगी बन के झूमना चाहती हूं।
मैं खामोशी सुनना चाहती हूं।

Anupriya

mujhe har baar...

उस उम्र की नजाकत को 
बार  बार देखना है...
मुझे हर बार तुम्हें
पहली बार देखना है।

जरा सा इश्क, जरा सी आस
जरा सी शर्म,जरा सी प्यास,
जरा सा ख्वाबों में तुमको
बेकरार देखना है...
मुझे हर बार तुम्हें
पहली बार देखना है।

वो चुप चाप आंखों से
जो बातें बोल जाते थे,
ना जाने गीत कितने 
मेरी कलम में घोल जाते थे
वही जज़्बात आंखों में
वही खुमार देखना है
मुझे हर बार तुम्हें 
पहली बार देखना है|

तुम्हें क्या याद है
जब नई किताबें घर पे लाते थे
तुम्हारा नाम उस पे लिख के 
अपना भूल जाते थे...
उसी दीवानगी में खुद को
शुमार देखना है...
मुझे हर बार तुम्हें
पहली बार देखना है।

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

valentine's day special

लिख के नाम कागज पे
गजल सा गुनगुनाऊं तुम्हें...
त्योहार हो तुम प्रेम का
आओ! मनाऊं तुम्हें...

तुम्हें माथे मैने सजा लिया
मेरी जिंदगी का श्रृंगार तुम
तुम्हें अंग मैने लगा लिया
मेरे हृदय पे रखा हार तुम।

तुम सांझ ,मेरी भोर तुम
मैं पतंग ,मेरी डोर तुम
तुम लक्ष्य और मैं रास्ता
मैं चलूं ,हो जिस ओर तुम...

बस जाओ मेरी पलकों में
सपनों का शहर दिखाऊं तुम्हें
ये प्रीत का विज्ञान है
उफ्फ !कैसे समझाऊं तुम्हें❤️❤️❤️

अनुप्रिया

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

ठहर गई है जिंदगी...

ठहर गई है जिंदगी
बस चल रही हूं मैं,
सांसों की आंच में देखो
पिघल रही हूं मैं।

ख्वाब ख्वाहिशें जुस्त - जू
सब बीती बातें हैं
'आज ' है एक आग
जिसमें जल रही हूं मैं।

ना जाने कितने दास्तां
समेट आंखो में
मन की बतिया कहने को
मचल रही हूं मैं।

जो देखते हैं अब
पुराने अख़बार की तरह
क्यों भूलते हैं
उनकी ही ग़ज़ल रही हूं मैं।

हर एक शाम सुरमई
सूरज की अोट से
कहती है जिंदगी थाम लो
निकल रही हूं मैं।

ANUPRIYA

बुधवार, 3 अप्रैल 2019

कलम - स्याही

जरा सम्भाल कर कागज पे रखो
टुकड़ा स्याही का,
जज़्बात लिखना इतना भी आसान नहीं है।
तख्त पलट जाते हैं इनके इक इशारे पे,
फ़्जों से खेलना बच्चों वाला काम नहीं है।

ताक़त है तुममें हर पल नया इतिहास लिखने की,
जो कल स्वर्णिम बनाए ऐसी कहानी आज लिखने की,
दोहराए जवानी हर सदी में जोश से भर कर
ऐसे गीत लिखने की, ऐसे साज़ लिखने की।

हुनर ये सोच कर परमात्मा ने तुमको बक्शा है
कलम मायूस ना हो जाए ,समझ लो ये भी ज़िम्मा है।
मुनासिब जो नहीं इंसानियत के वास्ते देखो
तुम्हारी शायरी को उन हदों से दूर रहना है।

कवि की कल्पना का
हर पल नया आयाम लिखते हो,
मोहम्मद की कहानी तो कभी तुम राम लिखते हो।
स्याही ना छूये तो खुदा भी अनकहा रह जाएगा,
इसलिए कभी गीता
तो कभी कुरान लिखते हो।

लिखने का इल्म है तो  सुबह
तुम नई लिख दो,
पसीने से तपा दिन, शाम लेकिन सुरमई लिख दो।
हवा का एक झोंका नाम कर दो उन परिंदो के
किस्मत में जिनके पल भर का भी आराम नहीं है।

जरा सम्भाल कर कागज पे रखो
टुकड़ा स्याही का,
जज़्बात लिखना इतना भी आसान नहीं है।
तख्त पलट जाते हैं इनके इक इशारे पे,
लब्जो से खेलना बच्चों वाला काम नहीं है।

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

तू अगर मेरा हो जाए

लब्जों को क्या चाहिए
बस एक ख्याल
जिसे अपनी बाहों में समेट
वो मुक्कमल हो जाए।

मिटा के नामों- निशान
अपना वजूद, अपनी पहचान
नदी की हसरत यही है कि
वो समंदर में खो जाए।

समझाए दुनिया को भले
बना के वो बहाने सौ
दिल यही चाहता है
मेरी गलियों में वो रोज आए।

ये दुनिया भर की दौलत
साजो- सामान चीज ही क्या है
खुदा को छोड़ दू मै
तू अगर मेरा हो जाए।

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

शाम होते ही मेरी बाहों में चले आना

तुम्हारे लम्हों से सदियों के बीच
के सफर में
वो जो सूकून के दो पल है ना
उसी में है मेरा आशियाना,
                               
हां! उसी चौक पे
जहां पेशानी पे तुम्हारे
शिकन आई थी ...
और तुम  बैठ गए थे थक कर...
याद है उसी वक्त किसी ने तुम्हे सहलाया था,
तुम्हारे गालों पे ढलकते आसुओं को पोंछ कर,
तुम्हे उम्मीद के कुछ फलसफे भी दे आया था।
तुम्हारी नींदों ने वही गिरा दिए थे
अपने टूटे हुए कुछ अधूरे से ख्वाब,
मैंने ही तो बड़ी शिद्दत से उन्हें उठाया था...
पहचाना ?

अपने सपनों के पंखों को फैला कर
आजाद परिंदो सा तुम उड़ों
समंदर की गहराई ,अनंत की ऊंचाई भी छू लो
अपनी इन ख्वाहिशों की धुन में लेकिन
अपने घर का पता तो मत भूलो...
अरे यार! तुम्हे चाहिए होगी ये दुनिया तमाम
मेरी तो दुनिया ही तुम हो...
सुनो!
गुजर जाए तुम्हारी सहर कहीं
पर शाम होते ही तुम
मेरी बाहों में चले आना

अनुप्रिया