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सोमवार, 8 नवंबर 2010

wirah...

विरह...

Girl Sitting Alone


तेरे जाने के बाद ओ साथी
पतझर का मौसम आया था,
मेरे ह्रदय के दीप्त व्योम पर
काला सा तम छाया था.

प्रीत की बोली गाने वाली
कोयल जाने कहाँ छुपी थी,
मीठी प्यास जगाने वाला
सावन भी अलसाया था.

सूनी सी थी मन की गलियां,
अनजानी लगती थी दुनिया,
सैकड़ों की भीड़ में मैंने
खुद तो तनहा पाया था.

तड़प-तड़प कर आँखें मेरी
तुझको ढूंढा करती थी,
व्याकुल हो कर इन होठों  ने
गीत विरह का गया था.

क्या बतलाऊं  कैसे बीते दिन,
कैसे बीता वह इक - इक पल,
शांत झील सा प्रतीत होता था
झरनों सा ये मन चंचल.

सपनों के रंगीन शहर में
विराना सा छाया था...
तेरे जाने के बाद ओ साथी
पतझर का मौसम आया था...

अनुप्रिया...

9 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

बेहद खूबसूरत भाव भर दिये हैं …………विरह का रंग ऐसा ही तो होता है……………सुन्दर प्रस्तुति।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

मन को भा गयी कविता ! बहुत सुन्दर !!

उपेन्द्र ने कहा…

virah ka bahoot hi sunder varnan..... sunder prastuti

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

सुंदर प्रवाह बनाती विरह रचना खूबसूरत है.

Anupriya ने कहा…

aap sab ka bahot bahot dhanyawad...

amar jeet ने कहा…

तेरे जाने के बाद ओ साथी,
पतझड़ का मौसम आया था !! वाह अनु जी हमें तो आपकी प्रारम्भ व अंत की ये दो लाइने बहुत अच्छी लगी अच्छी रचना के लिए बधाई हो !

Nithalla ने कहा…

क्या संयोग है, पतझड़ की कविता पतझड़ के मौसम में ही पढ़ रहे हैं, पतझड़ के जाने का इंतजार है, वो जाये तो बर्फवारी की तैयारी की जाये।

संजय भास्कर ने कहा…

अच्छी रचना के लिए बधाई

abhi ने कहा…

किसी की याद जब आती है तो बहुत कुछ होता है :)
बहुत खूबसूरत :)