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गुरुवार, 26 अगस्त 2010



जिन्दगी अपनी कब खुद के लिए जिया करते है,
हम तो बस रिश्तो का हक अदा करते है।


सुबह उठ्ठे तो छोटा सा लगा घर अपना,
इस लिए आज कल आपकी आँखों में रहा करते है।


देखिये बुत भी खुद को खुदा समझ बैठा
आप दिन रात क्यों सजदे में झुका करते है।


यहाँ हर आँख भींगी, हर लब पे एक फसाना है,
आप क्यों खुद को लोगो से जुदा समझते है।


उनके चेहरे को देखा तो फिर नज़र न हटी,
हाय ! हम मान गए , हम भी खता करते है।


अनुप्रिया ...

2 टिप्‍पणियां:

mai... ratnakar ने कहा…

यहाँ हर आँख भींगी, हर लैब पे एक फसाना है,

आप क्यों खुद को लोगो से जुदा समझते है।

bahuh hee khoob, bahut hee apanee see panktiyaan, badhai..............aur haan, mere blog par aa kar hoisala afzai ka shukriya

साकेत शर्मा ने कहा…

यहाँ हर आँख भींगी, हर लब पे एक फसाना है
क्या बात कही है आपने..बहुत खूबसूरत सोच..