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गुरुवार, 4 अगस्त 2022

पूछते हैं वो...

पूछते है वो 
मोहब्बत कितनी करते हो...
इश्क को मापने का कोई 
पैमाना हो तो कह दो...

तुम्हीं हो और बस
तुम्हीं रहोगे आखिरी दम तक
इसे जो आखिरी दम
ले के समझाना हो तो कह दो

कई तोहमत ज़माने ने 
हमारे नाम रखा है...
तुम्हें भी गर कोई इल्ज़ाम
लगाना हो तो कह दो...

रैन की गोद में दीपक 
कमल के फूल पे भौरे...
तुम्हें भी साथ उतना ही 
निभाना हो तो कह दो...

Anupriya

बुधवार, 24 नवंबर 2021

मुझे हर बार तुम्हें

उस उम्र की नजाकत को 
बार  बार देखना है...
मुझे हर बार तुम्हें
पहली बार देखना है।

जरा सा इश्क, जरा सी आस
जरा सी शर्म,जरा सी प्यास,
जरा सा ख्वाबों में तुमको
बेकरार देखना है...
मुझे हर बार तुम्हें
पहली बार देखना है।

वो चुप चाप आंखों से
जो बातें बोल जाते थे,
ना जाने गीत कितने 
मेरी कलम में घोल जाते थे
वही जज़्बात आंखों में
वही खुमार देखना है
मुझे हर बार तुम्हें 
पहली बार देखना है।

तुम्हें क्या याद है
जब नई किताबें घर पे लाते थे
तुम्हारा नाम उस पे लिख के 
अपना भूल जाते थे...
उसी दीवानगी में खुद को
शुमार देखना है...
मुझे हर बार तुम्हें
पहली बार देखना है।

ANUPRIYA

शनिवार, 10 अप्रैल 2021

मैं खामोशी सुनना चाहती हूं।

बंद आंखो के भीतर
एक नया संसार बुनना चाहती हूं।
मैं खामोशी सुनना चाहती हूं।

हृदय की ताल हो
एकांत गाए,
एक ऐसा गीत गुनना चाहती हूं।
मैं खामोशी सुनना चाहती हूं।

किसी अनजान पथ पे खुद को खोना,
बड़ा सुन्दर है जानो शून्य होना,
वहीं सौन्दर्य चुनना चाहती हूं।
मैं खामोशी सुनना चाहती हूं। 

माया मोह के ये ढोल - ताशे
जगत के भूल कर सारे तमाशे
जोगी बन के झूमना चाहती हूं।
मैं खामोशी सुनना चाहती हूं।

Anupriya

mujhe har baar...

उस उम्र की नजाकत को 
बार  बार देखना है...
मुझे हर बार तुम्हें
पहली बार देखना है।

जरा सा इश्क, जरा सी आस
जरा सी शर्म,जरा सी प्यास,
जरा सा ख्वाबों में तुमको
बेकरार देखना है...
मुझे हर बार तुम्हें
पहली बार देखना है।

वो चुप चाप आंखों से
जो बातें बोल जाते थे,
ना जाने गीत कितने 
मेरी कलम में घोल जाते थे
वही जज़्बात आंखों में
वही खुमार देखना है
मुझे हर बार तुम्हें 
पहली बार देखना है|

तुम्हें क्या याद है
जब नई किताबें घर पे लाते थे
तुम्हारा नाम उस पे लिख के 
अपना भूल जाते थे...
उसी दीवानगी में खुद को
शुमार देखना है...
मुझे हर बार तुम्हें
पहली बार देखना है।

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

valentine's day special

लिख के नाम कागज पे
गजल सा गुनगुनाऊं तुम्हें...
त्योहार हो तुम प्रेम का
आओ! मनाऊं तुम्हें...

तुम्हें माथे मैने सजा लिया
मेरी जिंदगी का श्रृंगार तुम
तुम्हें अंग मैने लगा लिया
मेरे हृदय पे रखा हार तुम।

तुम सांझ ,मेरी भोर तुम
मैं पतंग ,मेरी डोर तुम
तुम लक्ष्य और मैं रास्ता
मैं चलूं ,हो जिस ओर तुम...

बस जाओ मेरी पलकों में
सपनों का शहर दिखाऊं तुम्हें
ये प्रीत का विज्ञान है
उफ्फ !कैसे समझाऊं तुम्हें❤️❤️❤️

अनुप्रिया

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

ठहर गई है जिंदगी...

ठहर गई है जिंदगी
बस चल रही हूं मैं,
सांसों की आंच में देखो
पिघल रही हूं मैं।

ख्वाब ख्वाहिशें जुस्त - जू
सब बीती बातें हैं
'आज ' है एक आग
जिसमें जल रही हूं मैं।

ना जाने कितने दास्तां
समेट आंखो में
मन की बतिया कहने को
मचल रही हूं मैं।

जो देखते हैं अब
पुराने अख़बार की तरह
क्यों भूलते हैं
उनकी ही ग़ज़ल रही हूं मैं।

हर एक शाम सुरमई
सूरज की अोट से
कहती है जिंदगी थाम लो
निकल रही हूं मैं।

ANUPRIYA

बुधवार, 3 अप्रैल 2019

कलम - स्याही

जरा सम्भाल कर कागज पे रखो
टुकड़ा स्याही का,
जज़्बात लिखना इतना भी आसान नहीं है।
तख्त पलट जाते हैं इनके इक इशारे पे,
फ़्जों से खेलना बच्चों वाला काम नहीं है।

ताक़त है तुममें हर पल नया इतिहास लिखने की,
जो कल स्वर्णिम बनाए ऐसी कहानी आज लिखने की,
दोहराए जवानी हर सदी में जोश से भर कर
ऐसे गीत लिखने की, ऐसे साज़ लिखने की।

हुनर ये सोच कर परमात्मा ने तुमको बक्शा है
कलम मायूस ना हो जाए ,समझ लो ये भी ज़िम्मा है।
मुनासिब जो नहीं इंसानियत के वास्ते देखो
तुम्हारी शायरी को उन हदों से दूर रहना है।

कवि की कल्पना का
हर पल नया आयाम लिखते हो,
मोहम्मद की कहानी तो कभी तुम राम लिखते हो।
स्याही ना छूये तो खुदा भी अनकहा रह जाएगा,
इसलिए कभी गीता
तो कभी कुरान लिखते हो।

लिखने का इल्म है तो  सुबह
तुम नई लिख दो,
पसीने से तपा दिन, शाम लेकिन सुरमई लिख दो।
हवा का एक झोंका नाम कर दो उन परिंदो के
किस्मत में जिनके पल भर का भी आराम नहीं है।

जरा सम्भाल कर कागज पे रखो
टुकड़ा स्याही का,
जज़्बात लिखना इतना भी आसान नहीं है।
तख्त पलट जाते हैं इनके इक इशारे पे,
लब्जो से खेलना बच्चों वाला काम नहीं है।

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

तू अगर मेरा हो जाए

लब्जों को क्या चाहिए
बस एक ख्याल
जिसे अपनी बाहों में समेट
वो मुक्कमल हो जाए।

मिटा के नामों- निशान
अपना वजूद, अपनी पहचान
नदी की हसरत यही है कि
वो समंदर में खो जाए।

समझाए दुनिया को भले
बना के वो बहाने सौ
दिल यही चाहता है
मेरी गलियों में वो रोज आए।

ये दुनिया भर की दौलत
साजो- सामान चीज ही क्या है
खुदा को छोड़ दू मै
तू अगर मेरा हो जाए।

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

शाम होते ही मेरी बाहों में चले आना

तुम्हारे लम्हों से सदियों के बीच
के सफर में
वो जो सूकून के दो पल है ना
उसी में है मेरा आशियाना,
                               
हां! उसी चौक पे
जहां पेशानी पे तुम्हारे
शिकन आई थी ...
और तुम  बैठ गए थे थक कर...
याद है उसी वक्त किसी ने तुम्हे सहलाया था,
तुम्हारे गालों पे ढलकते आसुओं को पोंछ कर,
तुम्हे उम्मीद के कुछ फलसफे भी दे आया था।
तुम्हारी नींदों ने वही गिरा दिए थे
अपने टूटे हुए कुछ अधूरे से ख्वाब,
मैंने ही तो बड़ी शिद्दत से उन्हें उठाया था...
पहचाना ?

अपने सपनों के पंखों को फैला कर
आजाद परिंदो सा तुम उड़ों
समंदर की गहराई ,अनंत की ऊंचाई भी छू लो
अपनी इन ख्वाहिशों की धुन में लेकिन
अपने घर का पता तो मत भूलो...
अरे यार! तुम्हे चाहिए होगी ये दुनिया तमाम
मेरी तो दुनिया ही तुम हो...
सुनो!
गुजर जाए तुम्हारी सहर कहीं
पर शाम होते ही तुम
मेरी बाहों में चले आना

अनुप्रिया

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

मै लिखती हूं तुम गा देना...

मैं लिखती हूं ,तुम गा देना।
                     वो काव्य जो बहता है प्रतिक्षण
                     हम दोनों की आंखों में,
                     लयबद्ध भी होता रहता है
                     हौले- हौले से सांसों में,
मैं शब्दों में उसे पिरोती हूं
तुम सुर से उसे सजा देना।
मैं लिखती हूं , तुम गा देना।
                     मैं अविरल चंचल सी सरिता,
                      तुम चिर - थिर - स्थिर सागर हो।
                      मैं कोरी डोरी कल्पना की,
                      तुम सच हो, फिर भी सुंदर हो।
उत्तर  - दक्षिण का संगम ये
हो गया कैसे समझा देना।
मैं लिखती हूं तुम गा देना।
                        तुमसे मिल कर मेरे प्रियतम
                         मेरी कविता को अर्थ मिला,
                         जी उठी पंक्तियां भावों में
                         हर मुक्तक को संदर्भ मिला।
\,मेरी प्राण हीन रचनाओं में तुम
जीवन का अलख जगा देना।
मैं लिखती हूं तुम गा देना।
                         जीवन दो पल की बात प्रिय
                          ण  भर में होगी रात प्रिय
                          जब देह चिता बन जाएगी
                           छूटेगा ये भी साथ प्रिय।
जब नाम हमारा कहे कोई
राधे - कृष्णा सा साथ कहे,
मैं हृदय - हृदय में बस जाऊं
तुम प्राण - प्राण महका देना।
                             मैं लिखती हूं तुम गा देना।
                              मैं लिखती हूं तुम गा देना।
                          
                      

बुधवार, 3 मई 2017



यहाँ गिरे तो उठने सा मजा है,
इश्क की गलियों में संभलना क्या है ।

डुबो के दर्द में वो सुकून दे गया,
मोहब्बत मर्ज है तो आखिर दवा क्या है ।

मिली नजर तो कहीं हम कहीं हमारा वजूद,
उनकी आँखे हैं या पैमाना भरा है।

एक अदद जिस्म और मेरे नाम के सिवा,
मेरे वजूद में अब मेरा बचा क्या है।

चंद साँसो का सफर बेवजह सा, बेमानी  सा,
जिंदगी प्यार के सिवा क्या है।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

खुदा भी हंस पड़ा मेरे मोहब्बत के फ़साने पे,

हवा भी आज कानों में मेरी खिल्ली उड़ा गई।
दिन रात जागे हाय जिनके इन्तजार में
वो आये सामने जैसे ही हमको नींद आ गई।

कहानी ख़त्म हो जाती यहीं पर तो भी अच्छा था,
बताते शर्म आती है हमारा हाल ऐसा था,
वो कानो में सुनाते रह गए किस्सा मोहबत का,
हमारी आँख न खुली ,खुमारी ऐसी छा गई।

जुदाई कितनी भारी थी, कैसा बेदर्द आलम था,
तुम्हारे बिन तो हर मौसम यहाँ पतझर का मौसम था,
उन्हें हर दर्द अपना और हर आंसू दिखाना था,
आया होश भी कब , जब उन्हें वापस को जाना था।
फसाने दिल में रह गए, लबों पे आह आ गई ,
गए तुम क्या .तुम्हारे साथ मेरी हर अदा गई...


अनुप्रिया ...

शुक्रवार, 15 मार्च 2013















पाँव जैसे धरती,
सूरत अम्बर,
नन्ही  सी बिटिया
आई मेरे घर।

चिड़ियों सी चहके,
फूलों सी महके,
झूले झूला
सपनों पर।
प्यारी सी बिटिया
आई मेरे घर।

चीनी की बोरी  है ,
चंदा चकोरी है ,
मत देखो
लग जाएगी नज़र।
भोली सी बिटिया
आई मेरे घर।

मक्खन की मटकी ,
है रंगों की रंगोली,
रूनकी -झुनकी ,
रोली -पोली,
लगती है परियों सी सुन्दर।
दुलारी सी बिटिया
आई मेरे घर।


अनुप्रिया ...


सोमवार, 28 मार्च 2011

(in loving memory of my elder brother manuj kehari ,21 .9 . 1976 -26 .3 .2010 )

आज से ठीक १ साल पहले हमने उन्हें खो दिया...अजीब बात ये है कि जिस वक़्त वो जीवन और मृत्यु की लड़ाई लड़ रहे थे, ठीक उसी वक़्त मैं उनसे दूर बैठी अपना ब्लॉग अकाउंट बना रही थी...आने वाली दुर्घटना से अनजान मैं, अनजाने में ही अपने लिए वो मंच तैयार कर रही थी जिसने दुःख, अवसाद, और अकेलेपन के इस एक साल में मुझे सबसे ज्यादा संभाला...
मेरा ब्लॉग पढने वाले  और समर्थन करने वाले अजनबी मित्रों को मेरा बहुत- बहुत धन्यवाद.
वो मेरे दोस्त , दुश्मन भी (क्यों कि हम एक दुसरे से जिस तरह लड़ते थे वैसे दुश्मन ही लड़ा करते हैं)  ,गुरु भी(चलने से ले कर पढने तक, सब उन्होंने ही सिखाया यहाँ तक कि जीवन का उद्देश्य साधना भी उनसे ही सिखा मैंने) , आलोचक भी( मेरी कोई गलती उनकी नज़र से ओझल नहीं थी और न ही वो उसे बक्शते थे,तुरंत आलोचना करते थे) , पता नहीं और न जाने क्या-क्या  थे?  हाँ !पर उनके रहते कभी ये अहसास नहीं था कि अगर कभी वो न हुए तो मैं जीना भूल जाउंगी. मैंने बचपन से ले कर आज तक हजारों बार उनसे ये कहा कि मैं उनसे बहुत प्यार करती हूँ पर ये नहीं कहा कि भाई! मैं आपसे इतना प्यार करती हूँ कि अगर आप कभी नहीं रहे तो मैं जिन्दा लाश बन जाउंगी...आप मुझे छोड़ के कभी मत जाना.
काश कह दिया होता ...तो शायद...


 मैं जब से इस दुनिया को जानती हूँ, मेरे लिए सूरज, चाँद, आसमान और धरती ,और आस पास कि बाकी चीजों कि तरह वो भी सहज  थे. मैंने कभी सोचा ही नहीं कि वो नहीं होंगे...और मैं ...

 हे इश्वर ! उनकी आत्माँ को शांति देना, अपने ह्रदय में स्थान देना...उनसे कहना कि हम सब उनसे बहुत प्यार करते हैं, और जाने- अनजाने अगर हमसे कोई भूल हुई हो तो वो हम सब को छमा कर दें.

(आज मैं कुछ भी सोच समझ कर नहीं लिख रही...जो भावनाएं लिखवा रही हैं बस वो लिखती जा रही हूँ, सो, त्रुटियों के लिए खेद है.)



उस कयामत की शाम को

जिन्दगी हुई हमसे खफा...
रूह के हर जर्रे में
दर्द जैसे घुल गया...

घर की चौखट लाँघ कर
खुशियाँ गई शमशान को...
बूढी हड्डी ने दिया कन्धा
अपने अरमान को...

वो, वंश का जो मान था,
मृत्यु कि गोद में सो गया...
सौभाग्य रूठ कर हमारा
काल के गाल में खो गया...

चूड़ियाँ टूट कर, ह्रदय की
फर्श पर बिखरी हुई थीं ,
घर की शोभा बेवा हो कर
आँखों के आगे खड़ी थी...

माँ की चुप्पी में
सुनाई दे रहा चीत्कार था,
खो गया वो
जो उसके अस्तिव का आधार था...

अपनी कहूँ क्या ,मैं तो उसका
हिस्सा थी ,परछाई थी...
उसका जाना मुझसे मेरी
आप से ही विदाई थी...

आंसुओं के कई समंदर
एक पल में पीना
क्या होता है...
हमसे पूछो दोस्तों
मर- मर के जीना
क्या होता है...


अनुप्रिया....

(in  loving  memory of my elder brother manuj kehari  ,21  .9 . 1976 -26 .3 .2010  )








रविवार, 20 फ़रवरी 2011

पुरानी डायरी का एक पन्ना...

आज पुरानी डायरी में बरसों पुराना ख्वाब मिला. एक शाम घर कि छत पर बैठी सूर्यास्त देख रही थी. मुझे सूर्योदय और सूर्यास्त देखना बेहद पसंद है. आसमान के बदलते रंगों में जैसे जीवन की सारी उर्जा संचित होती है. १८ -१९ साल की उम्र थी तो कल्पनाएँ और सपने भी सूरज की लालिमा की तरह ही सुर्ख थे. उस दिन आसमान को निहारते हुए ये चंद पंगतियाँ लिखी थी मैंने.
चलिए आज आपसे इन्ही को बांटूं...काव्य के दृष्टिकोण से ये कैसी हैं ये बता पाने जितनी काबिलियत तो नहीं मुझमें, पर दिल के बेहद करीब है ये छोटे-छोटे सपने... 


 


जब संध्या का गुलाबी आँचल
अम्बर के सीने पर लहराता है
और सूर्य आकाश  सुंदरी के माथे पर
बिंदिया बन कर चमचमाता  है...
तब,
मैं अपनी तन्हाई में
प्रकृति के उस नयनाविराम
सौंदर्य को अपलक निहारा करती हूँ...
और,
सोचती हूँ कि
काश मैं भी आकाश सुंदरी सी होती,
मेरे भी तन पर सुर्ख गुलाब सा आँचल थिरकता,
और कोई सूर्य
मेरे भी माथे पर
दमकती  बिंदिया बन कर
मेरी गोरी काया को
नया आकर्षण प्रदान करता,
मुझे भी संसार उसी प्रशंसनीय नज़र से निहारता
जैसे
मैं अपनी तन्हाई में प्रकृति के उस
नयनाविराम सौन्दर्य को अपलक निहारा  करती हूँ....

अनुप्रिया...

                                                                          

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

तो कुछ और बात होती...

valentine's day special

 


मैं जिन्दगी हूँ तेरी, ये जानती हूँ लेकिन
कभी खुद से जो कह देते,तो कुछ और बात होती...
खामोशियों की जुबां भी समझती हूँ लेकिन
जो अल्फाज होते,तो कुछ और बात होती...



जो मोहब्बत लहू सी बसी हो रगों में,
वो मोहताज़ इजहार की तो नहीं हैं,
कभी डूब कर मेरी आँखों में लेकिन
इजहार जो कर देते तो कुछ और बात होती...


 इश्क चंचल नदी है जो रुकना ना जाने,
ये जमाने का कोई चलन भी ना माने,
तोड़ कर चंद रस्मों-रिवाजों के बंधन,
प्यार खुल के जो कर लेते तो कुछ और बात होती.


कभी तेरी नज़र से नज़रें उलझतीं,
कभी तन्हाइयों में मुलाकात होती.
रूहानी मोहब्बत है,मानती हूँ लेकिन
कभी बाहों में भर लेते तो कुछ और बात होती.


मैं जिन्दगी हूँ तेरी,ये जानती हूँ लेकिन
कभी खुद से भी कह देते तो कुछ और बात होती...





अनुप्रिया...











सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

जाने क्यों...



मोहब्बत   दिल में थी,
जाने क्यों जुबा पे लाई  ना गई.
हमसे कही ना गई,
तुमसे जताई  ना गई...

जो तुममें -मुझमें  था
वो हमसे  तो  पोशीदा रहा.
मगर वो बात
जमाने से ही छुपाई  ना गई...

सिलवटें गिनती रही
सारी रात बिस्तर की,
आग सीने की
किसी शय से बुझाई ना गई...

तुम्हारे प्यार में
इस बाँवरी ने क्या-क्या ना किया ?
हया की झीनी सी चादर ही      
मुझसे हटाई  ना गई...

एक जरा हाथ बढ़ाती  तो
प़ा लेती  तुमको,
हाय! वो दूरियां भी  मुझसे  
मिटाई ना गईं...

 

अनुप्रिया...






गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

तू इजाजत दे अगर...




तू  इजाजत दे  अगर
छोटी सी शरारत कर लूँ...
मैं तेरे दिल तक पहुँचने  की
हिमाक़त कर लूँ.

ख्वाब आँखों में
सजा लूँ आसमान वाले,
चाँद पाने की जरा सी
मैं भी हिम्मत कर लूँ...

दस्ताने-इश्क लिख दूँ
आफताब के नूर से, 
हीर-राँझा, लैला मजनूं
सी मुहब्बत कर लूँ...


रंग होठों से चुरा लूँ,
रौशनी रुखसार से,
अपनी कोरी जिन्दगी को   
क्यों ना जन्नत कर लूँ.

क्या ठिकाना साँसों का
कल  जिंदगानी  हो ना हो...
मिट्टी में मिल जाऊं मैं,
धड़कन में रवानी  हो ना हो...
छोड़ ना कल पे मुझे ,
कल ये दीवानी हो ना हो...
आज ,बस इस एक पल में
सदियों की चाहत कर लूँ...
तुझमें खो कर तुझको
प़ा जाने की हसरत कर लूँ...


अनुप्रिया...








 




शनिवार, 29 जनवरी 2011

काश ऐसा होता !



काश ऐसा होता !
मेरा ख्वाब हकीकत बन जाता,
और वक़्त का पहिया चलते-चलते
इन लम्हों में थम जाता...

काश ऐसा होता !
तुम्हारे बाँहों के घेरे में
मेरी तनहाइयाँ खो जाती,
तुम्हारी आँखों कि गहराई में
मेरी पूरी कायनात गुम हो जाती...

काश, ऐसा होता !
तुम्हारी आँखों के सारे मोती
सिमट आते मेरे आँचल में,
तुम्हारे जीवन के सारे अँधेरे
घुल जाते मेरे काजल में...

काश ऐसा होता !
तुम होते मेरे साथ हमेशा,
जैसे सीप और मोती,
सूरज और रौशनी,
मांग और सिंदूर,
दीपक और ज्योति...
काश ऐसा होता !

अनुप्रिया...

रविवार, 23 जनवरी 2011

जिन्दगी क्या है,एक सफ़र तनहा...

  
जिन्दगी क्या है,
एक सफ़र तनहा...
दोस्त लाखों हैं,
हम मगर तनहा...

ख़ुशी की सुबह में तो
भीड़ बहुत थी लेकिन,
उदास शाम  हुई
तो रहा वो घर तनहा...


जिसकी हर शाख थी
आशियाँ परिंदों का,          
ढली बहार तो रह  गया
वो शजर तनहा...


दर्द बरसता रहा
आँखों से सावन बन कर, 
भींगती रही मैं भी

रात भर तनहा...


अनुप्रिया...