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गुरुवार, 23 सितंबर 2010




कुछ अनसुनी सी दास्ताँ
सुना रही है आज हवा,
दिल का शायद हाल तुम्हारे
बता रही है आज हवा।


आई हो जैसे छू कर तुमको
तुम्हारे शहर से अभी अभी,
इस तरह तुम्हारी ख़ुशबू से
नहा रही है आज हवा।


कभी उड़ा देती हैं जुल्फें,
कभी हिलाएं आँचल को,
तुम सी सारी अदाएं मुझको
दिखा रही है आज हवा।


दूरियां तो हैं हमारे
जिस्म की मजबूरियां ,
देखो कैसे दो दिलों को
मिला रही है आज हवा।


कह रही है एक दिन
सिमट जायेंगे ये भी फासले,
मुझको, मेरी तन्हाई को
समझा रही है आज हवा।

4 टिप्‍पणियां:

वीना ने कहा…

दूरियां तो हैं हमारे
जिस्म की मजबूरियां ,
देखो कैसे दो दिलों को
मिला रही है आज हवा।
प्यार करने वाले चांद,हवा बारिश-बादल से हमेशा ही अपना हाल-ए-दिल कहते आए हैं....बहुत खूब
http://veenakesur.blogspot.com/

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों....बेहतरीन भाव....खूबसूरत कविता...

संजय भास्कर ने कहा…

आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को |

कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Anupriya ने कहा…

thankyou very much...