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शनिवार, 25 सितंबर 2010



सौ साल जैसे जिन्दगी का पल में गुजर गया,
जब वो सलोना चेहरा आँखों में उतर गया।


जुबान खामोश हो गई, मेरी सांसे रुक गई,
कुछ यूँ मिली नज़र कि मेरी नज़र झुक गई,

धडकनों का काफिला पल भर को ठहर गया,
जब वो सलोना चेहरा आँखों में उतर गया।


एक मासूमियत थी चेहरे पर, जो दिल को छू गई,
एक भाषा थी वो ख़ामोशी , जो सब कुछ कह गई,

चुप चाप खड़ी देखती रह गई मैं उसे,
और वो ना जाने कैसे मेरा जीवन बदल गया...

अनुप्रिया...

6 टिप्‍पणियां:

sada ने कहा…

सुन्‍दर शब्‍द रचना, भावमय प्रस्‍तुति ।

Akshita (Pakhi) ने कहा…

आपने तो बहुत अच्छी कविता लिखी...बधाई.


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'पाखी की दुनिया' में- डाटर्स- डे पर इक ड्राइंग !

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

सधे हुए शब्दों की सुंदर प्रस्तुति.... बहुत अच्छी लगी आपकी रचना ....अनुप्रिया

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति.

abhi ने कहा…

कभी ऐसे ही किसी के कारण जीवन बदल जाती है :)

arti jha ने कहा…

very nice anupriya ji....